भोपाल/इंदौर। मध्यप्रदेश के पटवारी जमीन से जुड़े कामों में पूरी तरह बट्टा लगा रहे हैं। एक तरफ वे काम नहीं करना चाहते, दूसरी तरफ वे रिश्वतखोरी में भी नंबर-1 हैं। ये पटवारी 'एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी' कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रहे हैं। पटवारियों का कहना है कि उनसे हुई गलती पर उनकी नौकरी जा सकती है। जबकि, सच्चाई इसके ठीक उलट है। इस काम में पटवारियों की ऊपरी कमाई मारी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें पटवारी घूस लेते रंगे हाथों पकड़े गए हैं। पटवारी कोई काम बिना लेन-देन के नहीं करना चाहते। हैरानी की बात यह है कि इन पटवारियों ने अपने-अपने निजी कार्यालय खोले हुए हैं। इन्हीं कार्यालयों में काली कमाई का निर्धारण होता है।
गौरतलब है कि हाल ही में स्वामित्व योजना के काम में भी पटवारियों ने लापरवाही दिखाई थी। इसे लेकर कलेक्टरों ने पटवारियों को फटकार लगाई थी और नौकरी से बर्खास्त करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिन, पटवारियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उल्टा, पटवारियों ने तर्क दिया कि रजिस्ट्री में कोई गलती हो गई तो उनकी नौकरी पर संकट आ सकता है। उनका कहना है कि अधिकारियों के तबादले के बाद गलती की जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी पड़ेगी और बचाव के लिए कोई सामने नहीं आएगा।
खास बातें
- घूसखोरी के मामलों में घिरे प्रदेश, चौंकाने वाले हैं आंकड़े
- दो साल में इंदौर-उज्जैन संभाग के 16 जिलों में 32 पटवारी रिश्वत लेते पकड़े गए
- 'एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी' कहावत को चरितार्थ कर रहे मध्यप्रदेश के ये पटवारी
चौंकाने वाला खुलासा करते ये आंकड़े
बता दें, पटवारियों की यह दलील कुछ प्रभाव नहीं डाल पा रही। क्योंकि, लोकायुक्त संगठन के आंकड़े पटवारियों की रिश्वतखोरी की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 2 सालों में इंदौर और उज्जैन संभाग के 16 जिलों में 32 पटवारी रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जा चुके हैं। इन सभी मामलों का संबंध जमीन से जुड़े कामकाज से है। नामांतरण, ऋण पुस्तिका जारी करने और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने जैसी प्रक्रियाओं के बदले दो हजार से लेकर एक लाख रुपये तक की रिश्वत मांगी गई।
जमीन संबंधी कामों के बदले मांगी जा रही रिश्वत
लोकायुक्त के एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो यहां तक बताया कि अकेले इंदौर संभाग में रिश्वतखोरी के 15 मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में आदिवासी और किसान पीड़ित थे। जमीन का बंटवारा, सीमांकन, ऋण पुस्तिका तैयार करने और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने जैसे कामों के बदले रिश्वत मांगी जा रही थी। शिकायतों का सत्यापन करने के बाद संबंधित पटवारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। 29 सितंबर को पटवारी खूमसिंह धारवे और कुलदीप यादव को दो लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया था। आरोप है कि दोनों किसान के नामांतरण की प्रक्रिया पूरी करने के लिए रिश्वत की रकम मिलने तक तैयार नहीं थे। आखिरकार पीड़ित किसान ने लोकायुक्त पुलिस से शिकायत की, जिसके बाद कार्रवाई की गई।
तीन हजार से लेकर दस हजार रुपये तक की मांग
जमीन संबंधी कामों के बदले रिश्वत मांगने के अन्य मामले भी सामने आए हैं। दिनेश जगताप ने एक प्लॉट का नामांतरण करने के लिए तीन हजार रुपये मांगे थे। लोकायुक्त पुलिस ने उसे रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ लिया। सजा होने के बाद उसे सेवा से बर्खास्त भी कर दिया गया। इसी तरह कला भट्ट ने एक किसान से कांकड़ की नपती के लिए दस हजार रुपये मांगे। किसान ने रिश्वत देने से इनकार किया तो काम रोक दिया गया। बाद में लोकायुक्त संगठन ने कार्रवाई करते हुए उसे दस हजार रुपये लेते पकड़ लिया।
ये भी है हैरानी की बात
बता दें, इंदौर जिले में कई पटवारियों ने अपने घरों या बाजारों में निजी कार्यालय बना रखे हैं। इन कार्यालयों में उन्होंने कामकाज के लिए दूसरे लोगों को भी नियुक्त कर रखा है। बंटांकन और सीमांकन जैसे कामों के लिए लोग सुबह आठ से दस बजे के बीच इन निजी दफ्तरों में पहुंचते हैं। वहीं, प्रशासनिक संकुल में भी पटवारियों के बैठने के लिए कक्ष निर्धारित हैं और उनके लिए समय भी तय है। इसके बावजूद ये कक्ष अधिकांश समय खाली रहते हैं। ऐसे में एक तरफ स्वामित्व योजना के तहत रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में देरी हो रही है, तो दूसरी तरफ जमीन संबंधी सामान्य कामों के लिए किसानों और आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।







